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.वो शाम कभी (a wishful evening)


by Ritika Gupta, whose work can be found here


वो शाम कभी आए जिसमें
तेरे नाम से रोशन महफ़िल हो
तू हो जाए किसी का भी
मेरी रूह में हर पल तुम ही हो
इश्क़ अगर फ़िरदौस है तो
मै पल पल तप दिन रात करूं
तू मुझमें या मैं तुझमें हूं
इस फर्क से में आज़ाद रहूं
तू चांद भी हो जाए अगर
मैं टकटकी बांध कर सांझ करूं
तू मुमकिन या नामुमकिन है
इस खौफ से मैं बेबाक रहूं।

I wait for the evening, where

a gathering is made radiant by your name.
You may belong to someone else,
yet you occupy eternal asylum in my soul.
If love were nirvana,
I would spend each moment in penance;
the difference between 'you in me' and 'me in you'

of which I remain free.
If you were the moon,
I would fix my gaze at your resplendence
Paralyzed between the possibility or impossibility of obtaining you

I am free of any fear.


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